Posted in Lord Ganesh, Lord Ganesh Images & wallpapers, Lord Ganesh Photos, Lord Ganesh wallpapers, Uncategorized

Most Unique, rare and unseen Pictures, images of Lord Ganesha | Lord Ganesh Good Morning Wishes Images & Photos

Rare Lord Ganesh images
Lord Ganesh Good Morning
Lord Ganesh Good Morning images
Lord Ganesh images with elephant
Lord Ganesh photos
Lord Ganesh dress images
Lord Ganesh siting image
Lord Ganesh Colorful Image
Lord Ganesh yellow background image
Lord Ganesh images in black color
Lord Ganesh morning time images
Lord Ganesh Creative images
Posted in भगवान कृष्ण, भगवान कृष्ण के १०८ नाम, Uncategorized

भगवान कृष्ण के १०८ नाम

db9be5081f88541becb7dcec2314dd082044273555036910774.jpg

अचल : स्थायी, स्थिर, निरंतर मनोहर : मनमोहक
अच्युत : अविनाशी मयूर : मोरपंखी वाले भगवान
अद्भुत : निराला भगवान मोहन : चित्ताकर्षक
आदिदेव : देवताओं के देवता मुरली : बांसुरी बजाने वाले भगवान
आदित्य : अदिति के पुत्र मुरलीधर : बांसुरी रखने वाले
अजन्मा : जीवन और मृत्यु से परे मुरलीमनोहर : मनमोहक बांसुरी बजाने वाले
अजय : जिसे जीता न जा सके नन्दकुमार : नन्द के बेटे
अक्षर : जिसे नुकसान न किया जा सके नन्दगोपाल : नन्द के बेटे
अमृत : जिसे मारा न किया जा सके नारायण : हर किसी के लिए शरण
आनंद सागर : ख़ुशी का भंडार माखनचोर : मक्खन चुराने वाले
अनंत : जिसका कोई अंत न हो निरंजन : निष्कलंक
अनंतजीत : जिसने सब कुछ जीत लिया हो निर्गुण : जिसके गुण का बखान न किया जा सके
अन्य : जिससे ऊपर कोई न हो पदमहस्त : कमल जैसे हाथ वाले
अनिरुद्ध : जिसको बाधित न किया जा सके पदमनाभ : कमल जैसी नाभ वाले
अपराजीत : जिसको हराया न जा सके पारब्रह्म : सबसे बड़ा सत्य
अवयुक्त : जिसमें कोई बुराई न हो परमात्मा : सबसे बड़ी आत्मा
बालगोपाल : बालक कृष्ण परमपुरुष : सबसे बड़ा पुरुष
बालकृष्णा: बालक कृष्ण पार्थसारथि : अर्जुन के सारथि
चतुर्भुज : चार भुजाओं वाला प्रजापति : सभी जीव जंतु के रचियता
दानवेन्द्र : दान देने वाला भगवान पुण्य : पनीत, पवित्र
दयालु : कृपालु पुरषोत्तम : सबसे उत्तम पुरुष
दयानिधि : कृपा का सागर रविलोचन : सूर्य जिसकी आँखें हैं
देवादिदेव : देवताओं के देवता सहस्त्रअक्ष : हज़ार आँखों वाला
देवकीनंदन : देवकी माँ के पुत्र सहस्त्रजीत : हज़ारों पर विजय प्राप्त करने वाला
देवेश : देवताओं के देवता साक्षी : सबकुछ देखने वाला
धर्माध्यक्ष : धर्म के प्रमुख सनातन : अनन्त
द्रविन : जिसका कोई क्षत्रु न हो सर्वजन : सर्वज्ञ, सर्वदर्शी
द्वारकापति : द्वारका के स्वामी सर्वपालक : सभी का पालन पोषण करने वाला
गोपाल : ग्वालों के साथ खेलने वाला सर्वेश्वर : सबका ईश्वर
गोपालप्रिय : ग्वालों के प्रिय सत्यवाचन : सदा सत्य बोलने वाला
गोविंद : गौ को प्रसन्न करने वाला सत्यव्रत : जिसने सत्य का साथ देने का संकल्प लिया हो
ज्ञानेश्वर : ज्ञान का भगवन शान्तः : अमनपसंद
हरि : प्रकृति के भगवान श्रेष्ठ : उत्कृष्ट
हिरण्यगर्भ : शक्तिशाली रचनाकर्ता श्रीकांत : सुन्दर
ऋषिकेश : सभी बुद्धि के भगवान श्याम : सावले वर्ण वाला
जगद्गुरु : सारे जगत के गुरु श्यामसुन्दर : सावले वर्ण वाला सुन्दर
जगदीश : जगत के भगवान सुमेधा : बुद्धिमत्तापूर्ण
जगन्नाथ : जगत के भगवान सुरेशम : सभी देवताओं का स्वामी
जनार्दन : सभी को आशीर्वाद देने वाले स्वर्गपति : स्वर्ग का स्वामी
जयंत : सभी दुश्मनों के विजेता त्रिविक्रम : तीनो लोक का विजेता
ज्योतिरादित्य : सूर्य की चमक उपेन्द्र : इंद्र का बड़ा भाई
कमलनाथ : देवी लक्ष्मी के नाथ वैकुण्ठनाथ : वैकुण्ठ के स्वामी
कमलनयन : कमल जैसी आँखों वाले वर्धमान : निराकार भगवान
कंसंतक : कंस का वध करने वाले वासुदेव : वासुदेव के पुत्र
कंजलोचन : कमल जैसी आँखों वाले विष्णु : सभी प्रचलित भगवान
केशव : घने काले बालों वाले विश्वदक्षिणा : विश्व को दक्षिणा देने वाले
कृष्ण : सावले वर्ण वाला विश्वकर्मा : विश्व का रचियता
लक्ष्मीकांतम् : देवी लक्ष्मी के नाथ विश्वमूर्ती : विश्व की मूर्ति
लोकाध्यक्षा : तीनों लोक के स्वामी विश्वरूप : विश्व का रूप
मदन : प्यार के भगवान विश्वात्मा : विश्व की आत्मा
माधव : ज्ञान से भरा भंडार वृषपर्व : धर्म के भगवान
मधुसूदन : मधु दानव का नाश करने वाले यादवेन्द्र : यादवों के स्वामी
महेंद्र : इंद्र के भगवान योगी : योग करने वाला
मनमोहन : मंन को मोहने वाला योगीनामपति : योगियों के स्वामी
Posted in आरती, खाटू धाम, खाटू नरेश, खाटू श्याम बाबा की फोटो, खाटू श्याम बाबा फोटो, जय श्री श्याम, फाल्गुन मेला खाटू श्याम जी, श्याम बाबा, श्याम बाबा की फोटो, श्री खाटू श्याम कथा, श्री खाटू श्याम जी, श्री खाटू श्याम जी मंदिर Information, Uncategorized

श्री खाटू श्याम कथा

home3

महाबली भीम के पुत्र घटोत्कच के विषय में हम सब जानते हैं । वीर घटोत्कच का विवाह दैत्यराज मुर की पुत्री मौरवी से हुआ । मौरवी को कामकंटका व आहिल्यावती के नामों से भी जाना जाता है । वीर घटोत्कच तथा महारानी मौरवी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई । बालक के बाल बब्बर शेर की तरह होने के कारण इनका नाम बर्बरीक रखा गया । इन्हीं वीर बर्बरीक को आज दुनिया ‘ खाटू श्याम ‘ के नाम से जानती है ।

वीर बर्बरीक को बचपन में भगवान श्री कृष्ण द्वारा परोपकार करने एवं निर्बल का साथ देने की शिक्षा दी गयी । इन्होनें अपने पराक्रम से ऐसे अनेक असुरों का वध किया जो निर्बल ऋषि – मुनियों को हवन – यज्ञ आदि धार्मिक कार्य करने से रोकते थे । विजय नामक ब्राह्मण का शिष्य बनकर उनके यज्ञ को राक्षसों से बचाकर, उनका यज्ञ सम्पूर्ण करवाने पर भगवान शिव ने सम्मुख प्रकट होकर इन्हें तीन बाण प्रदान किये, जिनसे समस्त लोगों में विजय प्राप्त की जा सकती है।

जब महाभारत के युद्ध की घोषणा हुई तो वीर बर्बरीक ने भी अपनी माता के सम्मुख युद्ध में भाग लेने की इच्छा प्रकट की। माता ने इन्हें युद्ध में भाग लेने की आज्ञा इस वचन के साथ दी कि तुम युद्ध में हारने वाले पक्ष का साथ निभाओगे।

जब भगवान श्री कृष्ण जी को वीर बर्बरीक की इस शपथ का पता चला तो उन्होंने वीर बर्बरीक की परीक्षा लेने की सोची । जब वीर बर्बरीक युद्ध में भाग लेने चले तब भगवान श्री कृष्ण जी ने राह में इनसे भेंट की तथा वीर बर्बरीक से उनके तीन बाणों की विशेषता के बारे में पूछा । वीर बर्बरीक ने बताया कि पहला बाण समस्त शत्रुसेना को चिन्हित करता है, दूसरा तीर शत्रुसेना को नष्ट कर देता है तथा तीसरे बाण की आवश्कता आज तक नहीं हुई । भगवान श्री कृष्ण ने एक पेड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा कि तुम इस स्थान को युद्धभूमि मानो तथा इस पेड़ के पत्तों को शत्रुसेना समझ कर अपनी युद्धकला को दिखाओ ।

इस बीच श्री कृष्ण जी ने वीर बर्बरीक की नजर बचाकर एक पत्ता पेड़ से तोड़कर अपने पैर के नीचे दबा लिया । वीर बर्बरीक द्वारा युद्धकला दिखाने के बाद श्री कृष्ण जी ने पूछा कि क्या तुम्हारे बाण ने सभी पत्तों को भेद दिया है ? वीर बर्बरीक के हाँ कहने पर श्री कृष्ण ने अपने पैर के नीचे दबे पत्ते को निकाला, उनकी हैरानी का कोई ठिकाना नहीं रहा जब उन्हें वह पत्ता भी बिंधा हुआ मिला ।

भगवान श्री कृष्ण जी को विश्वास हो गया कि वीर बर्बरीक के रहते युद्ध में पाण्डवों की विजय संभव नहीं थी । इसलिये वीर बर्बरीक से अपना शीश दान स्वरूप देने को कहा । वीर बर्बरीक अपना शीश सहर्ष देने को तैयार हो गये । वीर बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण के सम्मुख महाभारत का युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की । इस पर भगवान श्री कृष्ण ने प्रसन्न होकर दो वरदान दिये, पहला उनका शीश शरीर से अलग होकर भी हमेशा जीवित रहेगा व महाभारत युद्ध का साक्षी बनेगा और दूसरा यह कि कलियुग में तुम्हें (वीर बर्बरीक को) मेरे प्रिय नाम श्री श्याम के नाम से पूजा जायेगा । भगवान श्री कृष्ण जी ने वीर बर्बरीक के शीश को एक ऊँचे स्थान पर लाकर रख दिया । जहाँ से पूरी युद्ध भूमि दिखाई देती थी ।

महाभारत युद्ध की समाप्ति पर युधिष्ठर ने ब्रह्मसरोवर पर विजय स्तंभ की स्थापना की । पाण्डवों में इस बात पर बहस होने लगी कि महाभारत का युद्ध किस के कारण जीता गया ? जब पाण्डव आपस में बहस करने लगे तो उन्होंने श्री कृष्ण जी से इस संबंध में फैसला करवाने का निर्णय किया, भगवान श्री कृष्ण जी ने पाण्डवों से कहा कि इस बात का फैसला वीर बर्बरीक कर सकते हैं क्योंकि उन्होंने पूरा युद्ध एक साक्षी के रूप में देखा है ।

इस बात का फैसला करवाने हेतु श्री कृष्ण जी की आज्ञा पाकर पाण्डवों ने वीर बर्बरीक के शीश को लाकर विजय सतंभ (द्रोपदी कूप ब्रह्मसरोवर, कुरुक्षेत्र) पर स्थापित किया । पाण्डवों की बात सुनकर वीर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मुझे तो पूरी युद्ध भूमि में श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र तथा द्रोपदी का खप्पर दिकाई दिया अर्थात सभी वीर श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र से मारे गये तथा द्रोपदी (काली रूप में) ने खप्पर भर कर उन वीरों का रक्त पिया ।

महाभारत की समाप्ति पर यह शीश धरती में समा गया । भगवान श्री कृष्ण के वरदान अनुसार कलियुग में राजस्थान के खाटू नामक स्थान पर राजा को सपने में श्री कृष्ण जी ने दर्शन दिये तथा पावन शीश को निकाल कर उसे खाटू में प्रतिष्ठित करने की आज्ञा दी । आज वीर बर्बरीक के उसी पावन शीश की श्री खाटू श्याम के नाम से पूजा होती है ।

वह स्थान जहाँ श्री कृष्ण जी ने वीर बर्बरीक की परीक्षा ली थी, वर्तमान में हिसार के तलवंडी राणा के समीप बीड़ बर्बरान के नाम से प्रसिद्ध है । उस पेड़ जिसके पत्ते वीर बर्बरीक ने भेदे थे, आज भी बिंधे हुए होते हैं । वह स्थान जहाँ वीर बर्बरीक का शीश श्री कृष्ण द्वारा ऊँचे स्थान पर रखा गया था, वर्तमान में कैथल जिले के गाँव सिसला सिसमौर में है तथा वीर बर्बरीक की पूजा सिसला गॉंव में नगरखेड़ा बबरूभान के नाम से होती है, यह स्थान आज भी आस – पास के स्थान में बहुत ऊँचाई पर है ।

यह विजय स्तंभ जहाँ पाण्डवों द्वारा वीर बर्बरीक के शीश की स्थापना की गई थी वर्तमान में द्रोपदी कूप, कुरुक्षेत्र ब्रह्मसरोवर पर स्थित है । उस युग के वीर बर्बरीक आज कलियुग के श्याम है । इनके बारे में प्रसिद्ध है कि आज भी वे माता को दिये वचन के अनुसार इस संसार में हारने वाले इंसान का साथ देते हैं । इनका दरबार आज भी हारे का सहारा है ।

 

हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा