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Khatu Shyam Baba Images & Photos

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श्री खाटू श्याम कथा

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महाबली भीम के पुत्र घटोत्कच के विषय में हम सब जानते हैं । वीर घटोत्कच का विवाह दैत्यराज मुर की पुत्री मौरवी से हुआ । मौरवी को कामकंटका व आहिल्यावती के नामों से भी जाना जाता है । वीर घटोत्कच तथा महारानी मौरवी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई । बालक के बाल बब्बर शेर की तरह होने के कारण इनका नाम बर्बरीक रखा गया । इन्हीं वीर बर्बरीक को आज दुनिया ‘ खाटू श्याम ‘ के नाम से जानती है ।

वीर बर्बरीक को बचपन में भगवान श्री कृष्ण द्वारा परोपकार करने एवं निर्बल का साथ देने की शिक्षा दी गयी । इन्होनें अपने पराक्रम से ऐसे अनेक असुरों का वध किया जो निर्बल ऋषि – मुनियों को हवन – यज्ञ आदि धार्मिक कार्य करने से रोकते थे । विजय नामक ब्राह्मण का शिष्य बनकर उनके यज्ञ को राक्षसों से बचाकर, उनका यज्ञ सम्पूर्ण करवाने पर भगवान शिव ने सम्मुख प्रकट होकर इन्हें तीन बाण प्रदान किये, जिनसे समस्त लोगों में विजय प्राप्त की जा सकती है।

जब महाभारत के युद्ध की घोषणा हुई तो वीर बर्बरीक ने भी अपनी माता के सम्मुख युद्ध में भाग लेने की इच्छा प्रकट की। माता ने इन्हें युद्ध में भाग लेने की आज्ञा इस वचन के साथ दी कि तुम युद्ध में हारने वाले पक्ष का साथ निभाओगे।

जब भगवान श्री कृष्ण जी को वीर बर्बरीक की इस शपथ का पता चला तो उन्होंने वीर बर्बरीक की परीक्षा लेने की सोची । जब वीर बर्बरीक युद्ध में भाग लेने चले तब भगवान श्री कृष्ण जी ने राह में इनसे भेंट की तथा वीर बर्बरीक से उनके तीन बाणों की विशेषता के बारे में पूछा । वीर बर्बरीक ने बताया कि पहला बाण समस्त शत्रुसेना को चिन्हित करता है, दूसरा तीर शत्रुसेना को नष्ट कर देता है तथा तीसरे बाण की आवश्कता आज तक नहीं हुई । भगवान श्री कृष्ण ने एक पेड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा कि तुम इस स्थान को युद्धभूमि मानो तथा इस पेड़ के पत्तों को शत्रुसेना समझ कर अपनी युद्धकला को दिखाओ ।

इस बीच श्री कृष्ण जी ने वीर बर्बरीक की नजर बचाकर एक पत्ता पेड़ से तोड़कर अपने पैर के नीचे दबा लिया । वीर बर्बरीक द्वारा युद्धकला दिखाने के बाद श्री कृष्ण जी ने पूछा कि क्या तुम्हारे बाण ने सभी पत्तों को भेद दिया है ? वीर बर्बरीक के हाँ कहने पर श्री कृष्ण ने अपने पैर के नीचे दबे पत्ते को निकाला, उनकी हैरानी का कोई ठिकाना नहीं रहा जब उन्हें वह पत्ता भी बिंधा हुआ मिला ।

भगवान श्री कृष्ण जी को विश्वास हो गया कि वीर बर्बरीक के रहते युद्ध में पाण्डवों की विजय संभव नहीं थी । इसलिये वीर बर्बरीक से अपना शीश दान स्वरूप देने को कहा । वीर बर्बरीक अपना शीश सहर्ष देने को तैयार हो गये । वीर बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण के सम्मुख महाभारत का युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की । इस पर भगवान श्री कृष्ण ने प्रसन्न होकर दो वरदान दिये, पहला उनका शीश शरीर से अलग होकर भी हमेशा जीवित रहेगा व महाभारत युद्ध का साक्षी बनेगा और दूसरा यह कि कलियुग में तुम्हें (वीर बर्बरीक को) मेरे प्रिय नाम श्री श्याम के नाम से पूजा जायेगा । भगवान श्री कृष्ण जी ने वीर बर्बरीक के शीश को एक ऊँचे स्थान पर लाकर रख दिया । जहाँ से पूरी युद्ध भूमि दिखाई देती थी ।

महाभारत युद्ध की समाप्ति पर युधिष्ठर ने ब्रह्मसरोवर पर विजय स्तंभ की स्थापना की । पाण्डवों में इस बात पर बहस होने लगी कि महाभारत का युद्ध किस के कारण जीता गया ? जब पाण्डव आपस में बहस करने लगे तो उन्होंने श्री कृष्ण जी से इस संबंध में फैसला करवाने का निर्णय किया, भगवान श्री कृष्ण जी ने पाण्डवों से कहा कि इस बात का फैसला वीर बर्बरीक कर सकते हैं क्योंकि उन्होंने पूरा युद्ध एक साक्षी के रूप में देखा है ।

इस बात का फैसला करवाने हेतु श्री कृष्ण जी की आज्ञा पाकर पाण्डवों ने वीर बर्बरीक के शीश को लाकर विजय सतंभ (द्रोपदी कूप ब्रह्मसरोवर, कुरुक्षेत्र) पर स्थापित किया । पाण्डवों की बात सुनकर वीर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मुझे तो पूरी युद्ध भूमि में श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र तथा द्रोपदी का खप्पर दिकाई दिया अर्थात सभी वीर श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र से मारे गये तथा द्रोपदी (काली रूप में) ने खप्पर भर कर उन वीरों का रक्त पिया ।

महाभारत की समाप्ति पर यह शीश धरती में समा गया । भगवान श्री कृष्ण के वरदान अनुसार कलियुग में राजस्थान के खाटू नामक स्थान पर राजा को सपने में श्री कृष्ण जी ने दर्शन दिये तथा पावन शीश को निकाल कर उसे खाटू में प्रतिष्ठित करने की आज्ञा दी । आज वीर बर्बरीक के उसी पावन शीश की श्री खाटू श्याम के नाम से पूजा होती है ।

वह स्थान जहाँ श्री कृष्ण जी ने वीर बर्बरीक की परीक्षा ली थी, वर्तमान में हिसार के तलवंडी राणा के समीप बीड़ बर्बरान के नाम से प्रसिद्ध है । उस पेड़ जिसके पत्ते वीर बर्बरीक ने भेदे थे, आज भी बिंधे हुए होते हैं । वह स्थान जहाँ वीर बर्बरीक का शीश श्री कृष्ण द्वारा ऊँचे स्थान पर रखा गया था, वर्तमान में कैथल जिले के गाँव सिसला सिसमौर में है तथा वीर बर्बरीक की पूजा सिसला गॉंव में नगरखेड़ा बबरूभान के नाम से होती है, यह स्थान आज भी आस – पास के स्थान में बहुत ऊँचाई पर है ।

यह विजय स्तंभ जहाँ पाण्डवों द्वारा वीर बर्बरीक के शीश की स्थापना की गई थी वर्तमान में द्रोपदी कूप, कुरुक्षेत्र ब्रह्मसरोवर पर स्थित है । उस युग के वीर बर्बरीक आज कलियुग के श्याम है । इनके बारे में प्रसिद्ध है कि आज भी वे माता को दिये वचन के अनुसार इस संसार में हारने वाले इंसान का साथ देते हैं । इनका दरबार आज भी हारे का सहारा है ।

 

हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा

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ॐ श्री श्याम देवाय: नम:

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जय श्री श्याम, श्री खाटू श्याम परिवार में आपका स्वागत है

श्री खाटू श्याम जी का नाम आज केवल भारत में ही नहीं अपितु दुनिया में फैले करोड़ों हिंदुस्तानी लोगों कि अटूट श्रद्धा और विश्वास का विषय है। अपने नाम के अनुरूप ‘श्री खाटू श्याम जी’ कलियुग के अवतार तथा अपने भक्तों की सम्पूर्ण मनोकामनाओ को पूर्ण करने वाले हैं।

श्री खाटू श्याम जी जिनको आज दुनिया ‘हारे का सहारा’, ‘शीश का दानी’ तथा ‘कलियुग का अवतारी’ आदि नामों से जानती है, उन्होंने अपने शीश का दान भगवान् श्री कृष्ण जी के कहने पर इसी कुरुक्षेत्र कि पावन भूमि पर दिया था। आज देश विदेश में इनके असंख्य भव्य मंदिर हैं लेकिन कुरुक्षेत्र जो विश्व में ‘मंदिरों का शहर’ नाम से प्रसिद्ध है, श्री श्याम प्रभु के भव्य मंदिर से वंचित है।

श्री खाटू श्याम परिवार  में श्री खाटू श्याम जी के मंदिर का संकल्प लिया है। श्री खाटू श्याम जी अपने नाम के अनुरूप इस संसार में हारने वाले इंसान का साथ देते हैं। इनकी शरण में आने वाला व्यक्ति सभी प्रकार के दुःख व कष्टों से मुक्ति पाता है।

श्री खाटू श्याम परिवार कुरुक्षेत्र आप सभी भक्तों से श्री खाटू श्याम जी के मंदिर के निर्माण में सहयोग कि अपील करता हैं तथा श्री खाटू श्याम जी से प्रार्थना करता है कि वे आपके जीवन को सुखमय एवं ईश्वरोन्मुखी बनाए।

आप सभी भक्तों के सुझाव सादर आमंत्रित हैं, आपके सुझाव भविष्य में इस वेबसाइट को अधिक आकर्षक बनाने में सहयोगी बनेंगें।

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Baba Khatu Shyam Ji Ki Aarti in Hindi with Lyrics

 खाटू श्याम जी का मंदिर राजस्थान राज्य के सीकर जिले में स्थित है, वे पहले बाल्यकाल मे बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे और उन्हे कलयुग में श्री कृष्ण जी के नाम- श्याम से पूजे जाएँगे एसा श्री कृष्ण से वरदान प्राप्त किया था!

ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे |
खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे || ॐ

रतन जड़ित सिंहासन, सिर पर चंवर ढुरे |
तन केसरिया बागो, कुण्डल श्रवण पड़े ||

गल पुष्पों की माला, सिर पार मुकुट धरे |
खेवत धूप अग्नि पर दीपक ज्योति जले || ॐ

मोदक खीर चूरमा, सुवरण थाल भरे |
सेवक भोग लगावत, सेवा नित्य करे || ॐ

झांझ कटोरा और घडियावल, शंख मृदंग घुरे |
भक्त आरती गावे, जय – जयकार करे || ॐ

जो ध्यावे फल पावे, सब दुःख से उबरे |
सेवक जन निज मुख से, श्री श्याम – श्याम उचरे || ॐ

श्री श्याम बिहारी जी की आरती, जो कोई नर गावे |
कहत भक्त – जन, मनवांछित फल पावे || ॐ

जय श्री श्याम हरे, बाबा जी श्री श्याम हरे |
निज भक्तों के तुमने, पूरण काज करे || ॐ

Khatu Shyamji Temple is very unique and most popular Hindu temple of Rajasthan along with Salasar Balaji and Mehandipur Balaji temple. Khatushyamji is the religious circuit of Rajasthan that also includes temples of Rani Sati Temple, Jeen Mata and Salasar Balaji Hanuman temple.